Description
About The Book
यह कहानी एक ईमानदार सरकारी मुलाजिम विश्वनाथ और उनकी धर्मपत्नी रमा के पचास वर्षों के अनथक त्याग, प्रेम और स्वाभिमान की मार्मिक गाथा है| १६०० रुपये की सीमित पगार में बूढी माँ की तीमारदारी और तीन बच्चों की परवरिश के लिए इस दम्पति ने अपनी हर छोटी-बड़ी ख्वाहिश की आहुति दे दी; चाहे वह दो सौ रुपये की एक साधारण साडी को ठुकराना हो या शादी में मिले गहने बेचने|
माता-पिता के पसीने से सींचे गए तीनों बच्चे कामयाब हो कर विदेशों में जा बसे, और पीछे छुट गया एक सूना घर और बुजुर्ग दम्पति का मौन अकेलापन| स्वाभिमानी पिता नें बच्चों के पैसों को कभी अपनी लाचारी का सहारा नहीं बनने दिया|
पचासवीं सालगिरह की खामोश शाम को जब वे पुराने वादों और यादों के सहारे चाय की चुस्कियां ले रहे होते हैं, तभी अचानक तीनों बच्चे सपरिवार सरप्राइज बनकर चौखट पर दस्तक देते हैं| यह सुखद मिलन यह साबित कर देता है की इमानदारी और संस्कारों से सींचे गए रिश्ते दूरियों और वक़्त की गर्द तले कभी धुंधले नहीं पड़ते|
About The Author:
इस उपन्यास के लेखक गिरीश चौधरी, पेशा से चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं| 1952 में पटना में जन्मे श्री चौधरी मूलतः मिथिला क्षेत्र के दरभंगा जिला के निवासी हैं| इनका व्यावसायिक क्षेत्र पटना और जमशेदपुर रहा|
व्यावसायिक व्यस्तता में इनका कहानी लेखन का शौक खाता-बही के बीच दब कर रह गया था| करोना महामारी काल में जब सभी अपने अपने घरों में कैद हो गए थे, माननीय प्रधानमंत्री जी का ‘आपदा में अवसर ‘ वाला सुझाव इन्हें जैम गया| उस शांत माहौल में अपना पहला उपन्यास ‘सर्प दंश ‘ जो कोरोना की पृष्ठभूमि में पनपे प्यार की कहानी है, लिखना सुरु किया|
दुर्भाग्यवश ये एवं इनकी धर्मपत्नी भी इस महामारी से ग्रसित हो गए तो ये आधी अधूरी कहानी लैपटॉप में ही बंद हो कर रह गयी| अपने व्यवसाय से अवकाश लेने के बाद, 2026 में अनायास पत्नी जी ने इसकी जिज्ञासा की तो अपने लैपटॉप के दबे कोने से निकल कर उसे अंतिम रूप दिया| आज सर्प दंश छप कर बाज़ार में उपलब्ध है|
अंतहीन इनका दूसरा उपन्यास है| आशा है पाठक सर्प दंश की तरह अंतहीन को भी अपना समर्थन देंगें|






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