Description
“नार्यस्तु राष्ट्रस्य श्व:”यह सूक्ति केवल एक भावनात्मक उद्गार नहीं अपितु एक आर्थिक सत्य का उद्घोष है। इतिहास गवाह है कि जिन सभ्यताओं ने स्त्री को ‘पालनीय’ न समझकर उत्पादन का केंद्र माना वही सभ्यताएं वैश्विक मंच पर समृद्ध हुई हैं। आज जब भारत विकसित राष्ट्र (Viksit Bharat Vision @2047) की संकल्पना को साकार करने के लिए प्रयास रत है तो महिला सशक्तिकरण को केवल सामाजिक न्याय की दृष्टि से न देख कर आर्थिक अनिवार्यता (Economic Imperative) समझना अनिवार्य हो जाता है।
प्रस्तुत पुस्तक “नार्यस्तु राष्ट्रस्य श्व:”मिशन शक्ति: विकसित भारत मिशन @2047″उच्च शिक्षा के विद्यार्थियों शोधार्थियों तथा नीति निर्माता के लिए यह कैसा संदर्भ ग्रंथ है जो इस मूल प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास करती है कि”क्या भारत की आधी आबादी की उत्पादक क्षमता को पूर्णता शामिल किए बिना राष्ट्र का ‘धारणीय हरित आर्थिक विकास’ संभव है?
पारंपरिक अर्थशास्त्र स्त्री को प्राय कल्याण की वस्तु के रूप में समझता रहा है परंतु यह पुस्तक महिलाओं को विकास का संचालक सिद्ध करती है। पुस्तक पुस्तक 9 केवल सैद्धांतिक है बल्कि आंकड़ों ,नीतियों एवं केस स्टडीज पर आधारित है जो इसे परीक्षा में अनुच्छेद दोनों के लिए उपयोगी बनता है
अध्याय 1.2 में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026 और SDGs की चुनौतियों और उसके समाधान को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारतीय अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से समझाया गया है।
अध्याय 3 एवं 4 में आधुनिक अर्थशास्त्र (बेकर का समय सिद्धांत, सेन का क्षमता दृष्टिकोण) को वैदिक कालीन ऋषिकाओं के आर्थिक सामाजिक योगदान से जोड़ा गया है। यह अनूठा संयोजन सिद्ध करता है कि आर्थिक समावेशन भारत की सांस्कृतिक विरासत में निहित है। अध्याय 5 में जेंडर बजटिंग को वित्तीय नीति का ऐसा साधन बताया गया है जिसे पारंपरिक अर्थशास्त्र में काम आता गया था। यह अध्याय बताता है कि बजट में लैंगिक परिप्रेक्ष्य (Gender Lens) कैसे राजकोषीय दक्षता को बढ़ाता है। अध्याय 6एवं 7 सतत विकास, पर्यावरणीय स्थिरता एवं महिला सशक्तिकरण के त्रिकोण पर केंद्रित है। यह अध्याय इस तथ्य की व्याख्या करता है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाएं प्राकृतिक संसाधनों के सर्वोत्तम प्रबंधक हैं और उन्हें जलवायु वित्त का हिस्सा बनना अनिवार्य है। अध्याय 8 “वित्तीय समावेशन” में PMJDY, मुद्रा योजना एवं डिजिटल भुगतान के माध्यम से महिलाओं के बैंकिंग व्यवहार में आए बदलाव को श्रम उत्पादकता से जोड़ा गया है। अध्याय 9 9 गैर आर्थिक कार्य, देखभाल अर्थव्यवस्था एवं टाइम पॉवर्टी की व्याख्या करता है। घरेलू देखभाल अर्थव्यवस्था में किए गए कार्य जिसे जीडीपी में शामिल नहीं किया जाता है जबकि यह एक गुप्त पूंजी है।
यह पुस्तक “नारीवादी अर्थशास्त्र “की परिधि को पार करती है और”जनतांत्रिक अर्थशास्त्र”के सिद्धांत को स्थापित करती है जो सोचने की दक्षता देती है की आर्थिक योजनाएं कैसे अधिक समावेशी और प्रभावी बनाई जा सकती हैं। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रोफेसर क्लाउडिया गोल्डन ने यह सिद्ध किया_”लैंगिक अंतराल का अर्थ केवल असमानता नहीं बल्कि मानवीय संसाधन की क्षमता का ह्रास है। यह पुस्तक उसे राशि को रोकने के उपाय तथा ‘2047 ‘तक भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए एक रोड मैप प्रस्तुत करती है।
‘ नार्यस्तु राष्ट्रस्य श्व:”इस तथ्य को चुनौती है कि क्या वाकई भारत केवल पुरुष शक्ति से ही विकसित होगा या इसकी नारी शक्ति ही इसकी सबसे बड़ी तुलनात्मक लाभ है? इस ग्रंथ के माध्यम से हम उसे भारत की ओर अग्रसर होंगे जहां आर्थिक विकास के हर आयाम में नारी शक्ति की भागीदारी स्वत :सिद्ध हो।
अंत में शिक्षा जगत से जुड़े मेरे समस्त विद्वान पाठकों से मेरा विनम्र आगरा है कि इस पुस्तक को और अधिक उपयोगी बनाने हेतु अपना बहुमूल्य सुझाव अवश्य साझा करें।
धन्यवाद,
About The Author
डॉ आभा मिश्रा वर्तमान में बीआरडीबीडीपीजी कॉलेज आश्रम बरहज, देवरिया ( उत्तर प्रदेश) में अर्थशास्त्र विभाग की अध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में विगत 23 वर्षों के गहन अनुभव के साथ वह एक प्रतिष्ठित शिक्षा विद शोध कर्ता एवं लेखिका के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
उन्होंने देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों, सेमिनारों एवं कॉन्फ्रेंस में लगभग 22 शोध पत्र प्रस्तुत किया है। उनके आठ शोध पत्र प्रतिष्ठित पियर- रिव्यूड जर्नल्स में प्रकाशित हुए हैं। वह तीन संदर्भ पुस्तकों”इकोनामिक रिफॉर्म्स एंड एग्रीकल्चर”, “इकोनामिक रिफॉर्म्स 2nd जेनरेशन”तथा “फिनटेक क्रांति एवं भारतीय अर्थव्यवस्था”की लेखिका हैं। इसके अतिरिक्त विभिन्न विषय विशेषज्ञों द्वारा संपादित संदर्भ पुस्तकों में उनके 6 अध्याय प्रकाशित हो चुके हैं, जो शिक्षार्थियों ,शोधार्थियों एवं शिक्षा जगत से जुड़े लोगों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं।
अर्थशास्त्र की अकादमिक विशेषज्ञता के साथ ही डॉक्टर मिश्रा का लेखन महिला सशक्तिकरण, आर्थिक सुधार, कृषि अर्थव्यवस्था एवं सतत विकास जैसे विषयों पर केंद्रित रहा है। उनकी दृष्टि में शिक्षा केवल पाठ्य पुस्तकों तक सीमित न होकर जीवन को सृजनशील बनाने, उच्च मानवीय मूल्यों की स्थापना करने तथा मानवीय पूंजी निर्माण का एक सशक्त साधन है। शिक्षा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता शिक्षा को जीवनोपयोगी , व्यवहारिक एवं कल्याणकारी बनाने के प्रति निरंतर अग्रसर है।
प्रस्तुत पुस्तक “नार्यस्तु राष्ट्रस्य श्व:”मिशन शक्ति: विकसित भारत विजन @2047 में लेखिका ने महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण स्थिरता एवं धारणीय हरित विकास के अंत:संबंधों को गहनता से विश्लेषित किया है। यह पुस्तक उनकी इस दृष्टिकोण को रेखांकित करती है कि “देखभाल अर्थव्यवस्था” एवं “परिवार कल्याण”के बीच सीधा संबंध होता है, जिससे स्वस्थ ,शिक्षित एवं उत्पादक श्रम बल(productive& efficient labour force) तैयार होता है जो उत्पादक अर्थव्यवस्था एवं सतत विकास की नींव है। इतना ही नहीं महिलाएं केवल विकास की लाभार्थी नहीं बल्कि विकास की संवाहक एवं राष्ट्र की निर्माता हैं।






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